कभी ठहरकर सोचें - अगर एक दिन गाय चुप्पी तोड़कर हमसे बात करती, या हम उसके मन की भाषा समझ पाते, तो वह हमें क्या कहती? शायद कोई उपदेश नहीं - बस उतना, जितना एक माँ अपने उन बच्चों से कहती है जो बहुत दूर निकल गए हों। शायद उसके भीतर अभी भी वही पुराना आँगन बसता हो - जहाँ वह केवल एक पशु नहीं, जीवन की लय का हिस्सा थी। घर की सुबह उसी से शुरू होती थी, खेत की उर्वरता उससे जुड़ती थी, और जीवन की सरलता उसी के आसपास घूमती थी। तब समृद्धि का अर्थ केवल अधिक पाना नहीं, संतुलन में जीना था - धरती, अन्न और प्राणी के साथ। आज वह हमें देखती होगी - तेज़ भागते हुए, बहुत कुछ जुटाते हुए, पर भीतर से थकते हुए। हमने जीवन को तेज़ बना लिया, पर शांति पीछे छूट गई। सुविधाएँ बढ़ीं, पर सुकून कम हुआ। हमने सरलता छोड़ी, और अब जटिलताओं में सुकून ढूँढ रहे हैं। वह हमें रोकती नहीं, टोकती भी नहीं। बस देखती है - जैसे माँ देखती है अपने बच्चों को जो दुनिया जीतने निकले हैं, और एक दिन समझते हैं कि बहुत कुछ पा लिया, पर संतुलन कहीं पीछे छूट गया। अब प्रश्न उसके मन में नहीं, हमारे मन में है। जिसने बिना माँगे दिया, जो आज भी शांत खड़ी है -...
गौमाता की आज की पीड़ा न धर्म की दी हुई राह है, न वेदों की वाणी। यह वह जीवन नहीं जो हमें शास्त्रों ने जीना सिखाया था, यह उस स्मृति के मिट जाने की पीड़ा है जहाँ सेवा को साधना माना गया था और करुणा को पूजा। ऋषियों ने गाय को माँ कहा था तो अधिकार के लिए नहीं, उत्तरदायित्व के लिए। माँ कहने का अर्थ था — अंत तक साथ, हर अवस्था में संरक्षण। हमने भी माँ कहा — पूरे विश्वास और गर्व के साथ। मंदिरों में, मंचों पर, पोस्टरों और नारों में। लेकिन जब वही माँ सड़क किनारे भूखी खड़ी थी, जब उसकी आँखें सहारे की तलाश में थीं, तो हमारी श्रद्धा कहीं और व्यस्त थी। हमने धर्म को कहने में अपनाया, पर जीने में नहीं। और यही सबसे असहज सत्य है — माँ कहा हमने बार-बार, पर पुत्र बनकर माँ के चरणों में अंत तक बैठ पाने की साधना हमसे छूट गई। आज प्रश्न यह नहीं है कि गाय माँ है या नहीं। प्रश्न यह है कि क्या हम अब भी माँ के योग्य पुत्र हैं? क्योंकि जिस समाज में माँ शब्दों में पूजी जाए और जीवन में उपेक्षित रहे, वहाँ समस्या गाय की नहीं होती — वहाँ समस्या हमारे भीतर मरती हुई संवेदना की होती है।
Comments
Post a Comment