अगर गोमाता बोलती… तो हमसे क्या कहती ?
कभी ठहरकर सोचें -
अगर एक दिन गाय चुप्पी तोड़कर हमसे बात करती,
या हम उसके मन की भाषा समझ पाते,
तो वह हमें क्या कहती?
शायद कोई उपदेश नहीं -
बस उतना, जितना एक माँ अपने उन बच्चों से कहती है
जो बहुत दूर निकल गए हों।
शायद उसके भीतर अभी भी वही पुराना आँगन बसता हो -
जहाँ वह केवल एक पशु नहीं,
जीवन की लय का हिस्सा थी।
घर की सुबह उसी से शुरू होती थी,
खेत की उर्वरता उससे जुड़ती थी,
और जीवन की सरलता उसी के आसपास घूमती थी।
तब समृद्धि का अर्थ केवल अधिक पाना नहीं,
संतुलन में जीना था -
धरती, अन्न और प्राणी के साथ।
आज वह हमें देखती होगी -
तेज़ भागते हुए,
बहुत कुछ जुटाते हुए,
पर भीतर से थकते हुए।
हमने जीवन को तेज़ बना लिया,
पर शांति पीछे छूट गई।
सुविधाएँ बढ़ीं,
पर सुकून कम हुआ।
हमने सरलता छोड़ी,
और अब जटिलताओं में सुकून ढूँढ रहे हैं।
वह हमें रोकती नहीं,
टोकती भी नहीं।
बस देखती है -
जैसे माँ देखती है अपने बच्चों को
जो दुनिया जीतने निकले हैं,
और एक दिन समझते हैं
कि बहुत कुछ पा लिया,
पर संतुलन कहीं पीछे छूट गया।
अब प्रश्न उसके मन में नहीं,
हमारे मन में है।
जिसने बिना माँगे दिया,
जो आज भी शांत खड़ी है -
हमने उससे बहुत लिया।
पर क्या कभी ठहरकर यह सोचा
कि हमने लौटाया क्या?
शायद बात केवल गाय की नहीं,
उस दृष्टि की है
जिसने हमें संतुलन सिखाया था।
और शायद वही दृष्टि
आज भी हमारी प्रतीक्षा में है।
हम आगे बढ़े - यह गलत नहीं।
पर जड़ों से कटकर आगे बढ़ना
अक्सर भीतर खालीपन छोड़ देता है।
क्योंकि हर थका हुआ मन
आख़िर किसी गोद की तलाश करता है।
शायद वह आज भी
बस इतना ही चाहती है --
हम लौट आएँ।
माँ की गोद में लौटना हार नहीं,
यही जीवन का सबसे सच्चा संतुलन है।

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