हम चुनते नहीं हैं, हमें चुना जाता है

हम चुनते नहीं हैं, हमें चुना जाता है

कल्चर इंडस्ट्री का अर्थ है - 

संस्कृति का बाज़ार में बदल जाना।

फ़िल्म, संगीत, टीवी, विज्ञापन और सोशल मीडिया

अब अभिव्यक्ति के माध्यम नहीं रहे,

बल्कि मुनाफ़े से संचालित उत्पाद बन चुके हैं।


जो फ़िल्म या संगीत चल जाता है,

वही एक फ़ॉर्मूला बन जाता है।

उसी जैसी कहानियाँ,

उसी तरह की धुनें

बार-बार इसलिए दोहराई जाती हैं,

क्योंकि बाज़ार जोखिम नहीं,

सुनिश्चित बिक्री चाहता है।


मनोरंजन थकान से राहत तो देता है,

लेकिन सोच जगाकर नहीं,

बल्कि ध्यान भटकाकर।

दिन भर के तनाव के बाद

स्क्रीन और रील्स

मनुष्य को डुबो देती हैं,

ताकि वह सवाल न पूछे।


इसी प्रक्रिया में

हमारी ख़रीद भी स्वतंत्र नहीं रहती।

हम वह नहीं ख़रीदते

जो हमें सच में चाहिए,

हम वह ख़रीदते हैं

जो बाज़ार हमसे ख़रीदवाना चाहता है।

ब्रांड्स ज़रूरतें नहीं,

पहचान का भ्रम बेचते हैं।


इस तरह आधुनिक गुलामी

डर और सज़ा से नहीं,

बल्कि सुविधा, मनोरंजन और विकल्पों के भ्रम से चलती है।

मनुष्य को लगता है कि वह आज़ाद है,

जबकि उसकी पसंद, स्वाद और चाह

पहले ही तय कर दी गई होती है।


यही “संतुष्ट गुलामी” है—

जहाँ मनुष्य खुश भी है,

और नियंत्रित भी।

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