गोमाता और गोपालन: एक ईमानदार सार

गोमाता और गोपालन: एक ईमानदार सार

आज का गोपालन ज़्यादातर डेयरी व्यवसाय बन चुका है।

गाय अब घर का हिस्सा कम,

उत्पादन की इकाई ज़्यादा दिखाई देती है।

अधिक दूध के लिए कृत्रिम गर्भाधान,

लगातार दोहन,

और उपयोगिता कम होते ही उपेक्षा—

यह कठोर सच्चाई है,

जिसे हम सब जानते भी हैं और नज़रअंदाज़ भी करते हैं।


ऐसे में गाय को “माँ” कहना

नई पीढ़ी को असहज करता है।

उन्हें शब्द से नहीं,

हमारे व्यवहार से समस्या है।

जब सम्मान भाषण में हो

और व्यवहार हिसाब-किताब में,

तो प्रश्न उठना स्वाभाविक है।


परंपरा में गाय को माँ इसलिए कहा गया

क्योंकि वह केवल दूध का स्रोत नहीं,

गृहस्थ जीवन की धुरी मानी जाती थी।

वैदिक जीवन-दृष्टि में

गाय, भूमि और अन्न

तीनों एक ही संतुलन के अंग थे।

बछड़े का अधिकार पहले था,

दूध सीमित था,

और संरक्षण जीवनभर का दायित्व।

सम्मान उपयोगिता से बड़ा था।


आज स्थिति उलट है—

दूध पूरा हमारा,

बुढ़ापा उसका अपना।

पूजा के दिन अलग,

व्यवहार के दिन अलग।

शब्दों में “माँ”,

प्रणाली में “संसाधन”।


हमने परंपरा रख ली,

पर उसके पीछे की ज़िम्मेदारी छोड़ दी।

धर्म का भाव रखा,

पर अनुशासन नहीं।

करुणा की भाषा रखी,

पर सुविधा की आदत भी।


अब हमारे सामने तीन स्पष्ट रास्ते हैं—

* अगर यह सिर्फ़ व्यवसाय है, तो उसे धर्म का नाम न दें।

* अगर यह आजीविका और सेवा दोनों है, तो लाभ और दायित्व दोनों स्वीकारें।

* और अगर यह सच में धर्म है, तो करुणा लाभ से ऊपर रखनी होगी।


गाय को माँ कहना समस्या नहीं है।

माँ कहकर माँ जैसा व्यवहार न करना ही समस्या है।


समाज को शब्द बदलने की नहीं,

ईमानदार होने की ज़रूरत है।

या तो हम इसे व्यवसाय मानें,

या सच में संबंध मानें।

बीच की सुविधा

सबसे बड़ा विरोधाभास है।

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